रविवार, 19 जुलाई 2009

"बूढा बरगद"


इस बरगद के नीचे पुराने बिन्दुवासिनी मन्दिर की आकृति रखी है। मुख्य मन्दिर का गुम्बद आज भी पुराना ही है।

"पशिमी द्वार"


पश्चिम की ओर गोलाकार द्वार, जहाँ से राजमहल की पहाड़ियों की शृँखला दिखती है।

"गुरु-मन्दिर"


पहाड़ी बाबा के "दादा-गुरु" लाहिडी महाशय को समर्पित गुरु मन्दिर। लाहिड़ी महाशय ने बाबाजी महाराज के कहने पर "क्रिया-योग" का प्रवर्तन किया था।

"यात्रिका"


झारखण्ड सरकार (पर्यटन विभाग) के पैसों से बना भवन। भवन पर "यात्रिका" लिखा है- इससे तो यही अनुमान लगाया जा सकता है कि यह भवन दूर से आने वाले यात्रियों के ठहरने के लिए बना है। मगर यह कब चालु होगा- कोई नहीं बता सकता।

"गेस्ट हाऊस"


एक और सरकारी भवन। शायद यह सरकारी अधिकारियों के लिए बना रेस्ट हाऊस है।

"वानप्रस्थ-आश्रम"


यह जर्जर भवन (जो पिछले तीस वर्षों से B.S.K. कॉलेज के अधीन है) पहाड़ी बाबा के समय में वानप्रस्थ आश्रम हुआ करता था, जहाँ जीवन के तीसरे-चौथे चरण में पहुँच चुके भक्तजन आकर कुछ समय ठहरते थे।

"हनुमत पद-चिन्ह"



कहते हैं कि जब हनुमानजी हिमालय से पर्वत लेकर आकाश मार्ग से लंका जा रहे थे, तब इस पर्वत चोटी की एक शिला पर उन्होंने अपना एक पैर रखा था। शिला पर पैर के आकार का गड्ढा था। लापरवाही के कारण उस पैर के आकार का निशान अब बिगड़ गया है।

"विशालकाय हनुमानजी"


हनुमानजी की प्रायः छत्तीस फीट ऊंची प्रतिमा। इसी चोटी पर एक "ध्यान-कक्ष" बनवाने की भी योजना है, जहाँ बाबाजी महाराज की प्रतिमा स्थापित होगी।

"सूर्यास्त"


इस चोटी से वैसे तो सूर्योदय और सूर्यास्त- दोनों का आनंद लिया जा सकता है, मगर सूर्यास्त का दृश्य ख़ास होता है। 'राजमहल की पहाड़ियों' के पीछे छुपते सूर्यदेव।

(इस ब्लॉग के सभी फोटो बरहरवा वासी श्री चंद्रशेखर (न्यू रुपश्री स्टूडियो, विन्दुधाम पथ) द्वारा खींचे गए हैं- सिर्फ़ इस सूर्यास्त वाले फोटो को छोड़कर। उनके डिजीटल कैमरे से इसे मैंने स्वयं खींचा था।)

(इस ब्लॉग को जुलाई' 09 में प्रकाशित किया था. एक साल बाद जुलाई' 10 में मोबाईल के कैमरे से खींचकर मैंने कुछ और फोटो इसमें जोड़े हैं.) 

"राजमहल की पहाडियां"


'हनुमान चोटी' से राजमहल की पहाड़ियों का विहंगम दृश्य। इस चोटी के नीचे वादियों में पहली जनवरी के दिन पिकनिक मनाने की परम्परा है। अब बस्ती बस जाने तथा B.S.K. कॉलेज के भवन बन जाने के कारण वादी के सौन्दर्य और क्षेत्रफल- दोनों में कमी आ गई है, फ़िर भी, पहली जनवरी को यहाँ मेला लग ही जाता है।


"पहाड़ी बाबा की कुटिया"


पहाड़ी बाबा की कुटिया। पहले फूस की छप्पर थी।


(कुटिया के अन्दर) पहाड़ी बाबा की पूजा 

"बाबा की कुर्सी"


पहाड़ी बाबा बारह वर्षों तक (१९६०-१९७२) इस आश्रम में रहे। इसी फोल्डिंग चेयर पर बैठकर बाबा भक्तों से बात-चीत करते थे, उनकी समस्याओं का समाधान करते थे।

"व्याघ्र आसन"


पहाड़ी बाबा का व्याघ्र-आसन। पहले यह आसन "दीक्षा कुटीर" में रखा रहता था।

रविवार, 28 जून 2009

"अद्वैतम"


अपनी कुटिया के सामने स्थित इस छोटी-सी गुफा को बाबा ने "अद्वैतम" नाम दिया था। यहाँ वे ब्रह्म-मुहूर्त में ध्यान लगाया करते थे।

शुक्रवार, 12 जून 2009

"दीक्षा कुटीर"

"अद्वैतम" गुफा के ठीक ऊपर "दीक्षा कुटीर" थी। अभी इसका पुनर्निमाण चल रहा है। इसके प्रवेश द्वार पर "आनंदम" लिखा है।
पुनर्निर्माण के बाद "दीक्षा कुटीर" का नया रुप. पहले फूस की झोपड़ी थी. 



"एक चिन्ह"


जिस प्रकार अद्वैतम गुफा के प्रवेशद्वार पर 'शंख-कमल' और दीक्षा कुटीर के प्रवेशद्वार पर 'त्रिनेत्र' बने हैं, उसी प्रकार बाबा की कुटिया की चहारदीवारी पर यह चिन्ह बना है। कभी यहाँ खुशबूदार "कटहली चंपा" के फूल खिला करते थे।

"समाधी स्थल"

बाबा की इच्छानुसार बाबा को हरिद्वार में "जलसमाधि" दी गई थी। इसलिए उनकी तो कोई समाधी नही है, मगर इस आश्रम के अन्य सन्यासियों का यह समाधी स्थल है।
इस स्थल के सामने (बाबा की कुटिया के बगल में) बच्चों का पार्क हुआ करता था।

"कैफेटेरिया"

सरकारी पैसों से बना चालू होने की बाट जोहता कैफेटेरिया। वैसे चिंता न करें- 'माणिक दादा का नाश्ता दूकान' इस पहाड़ी पर कोई तीस वर्षों से यात्रियों को रिफ्रेशमेंट प्रदान कर रहा है।



माणिक दा की चाय-नाश्ते की दूकान.  (पहाड़ी के पीछे उनका भोजनालय भी है.) 

"गौशाला"

बिन्दुधाम का गौशाला। इसके बाहर गोपाष्टमी की शाम 'गौशाला मेला' लगता है।

शनिवार, 6 जून 2009

"अमृत कलश"

पहाड़ी बाबा की जन्म-शतवार्षिकी (गुरु-पूर्णिमा' २०००) के अवसर पर स्थापित "अमृत कलश"।