प्रसंग-3



योग और तंत्र में भयंकर भिड़न्त

- अनाथानन्द

पिछले अंक में श्री अनाथानन्द द्वारा (बिन्दुधाम, बरहरवा के पहाड़ी बाबा की स्मृति में) रचित पुस्तक जाने अनजाने प्रसाद के दो दाने का एक अध्याय (एक हाँड़ी डेढ़ किलो रसगुल्ला) आपने पढ़ा था, इस बार उसी पुस्तक से एक और रोचक अध्याय . . .


इतिहास अपने काल और क्षण की हर घड़ी पर अपनी आँखें टिकाये था। कालचक्र और घटनाचक्र, दोनों पहिये की तरह अबाध गति से अनवरत घूम रहे थे। जाने-अनजाने बिन्दुधाम के कण-कण में मेरे गुरू के क्षण-क्षण का इतिहास लिखा जा रहा था। बड़हरवा बिन्दुधाम से अटूट रिश्ता जुड़ चुका था। कितना आकर्षण था! कभी कोर्ट बन्द होने पर, कभी यों ही, बड़हरवा पहुँच जाता था। गुरू दर्शन की इच्छा बराबर बनी रहती थी। परिचय का दायरा धीरे-धीरे बढ़ चुका था। बाबा ने जिन लोगों को दीक्षा दी, उनमें से किसी को भी तंत्र की दीक्षा नहीं प्राप्त हुई। तंत्र से यहाँ आशय है पूर्ण तंत्र। शुद्ध एकमात्र तंत्र। किन्तु एक अपवाद रहा। बाबा के शिष्यों में एक शिष्य थे वक्ताराम। पेशे से इंजीनियर थे। बाबा से केवल उनको ही तंत्र की दीक्षा मिली थी। श्मशान उनका निवास स्थान था। कारन (मदिरा) उनका एकमात्र पेय पदार्थ था। माँस, मछली भोजन था। दुर्गा शप्तशती पूर्णरुप से उन्हें कण्ठस्थ था। जब वक्ताराम बाबा उसका सस्वर पाठ करते थे, तो भक्तगण बरबस वहाँ पहुँच जाते थे। फिर क्या था! वक्ताराम बाबा के हाथ में पौ-बारह की कहावत चरितार्थ होती थी। पूज्यपाद गुरूदेव मना करते थे कि वक्ताराम को पैसे मत दो। पूज्यपाद गुरूदेव कहा करते थे कि अगर वक्ताराम पीना छोड़ दे, तो तंत्र में उसकी मिसाल नहीं। ऐसे तो बँगाल के कई श्मशानों में वक्ताराम वास करते थे, परन्तु अपने गुरू से मिलने बराबर पहाड़ पर आते-जाते रहते थे।
                ऐसी ही एक बेला थी। सुबह का सूरज पहाड़ों की ओट से झाँक रहा था। प्रकृति की अपूर्व छटा फैली थी। चिडि़यों की चहचहाहट के साथ-साथ, माँ मन्दिर की घण्टी वातावरण को मोहक बना रही थी। वक्ताराम बाबा आसन मारे बैठे थे। बाबा की कुटी और अद्वैतम गुफा के बीच की पगडण्डी जहाँ मुड़ती थी, वहीं एक पुरानी कुटी थी। अभी भी उसका अवशेष विद्यमान है। उस कुटी के बाहर एक छोटे बरामदे में वक्ताराम बाबा कुर्सी पर डटे थे। अभी उनकी रात की खुमारी मिटी नहीं थी। नशे की लालिमा वक्ताराम बाबा की आँखों में छायी थी। मैं भी बगल में बेंच पर बैठा था। दो-चार गुरूभाई भी साथ थे। इधर-उधर से बाबा के यहाँ जानेवालों का ताँता लगा था। यह ताँता कभी टूट भी जाता था, पर इक्के-दुक्के लोग बराबर आते-जाते रहते थे। धूप धीरे-धीरे और तेज होती जा रही थी। चाय की दौर जोरों पर थी। किन्तु वक्ताराम बाबा की प्यास कुछ और की थी। वे किसी ऐसे भक्त की तलाश में थे, जो कुछ चढ़ावाचढ़ावे और कारनसे मुखशुद्धि करावे। तंत्र की भाषा में मदिरा को कारन कहा जाता है। पर कोई उपयुक्त पात्र नहीं मिल रहा था। जहाँ वक्ताराम बाबा बैठे थे, वहाँ से थोड़ी दूरी पर पूज्यपाद गुरू महाराज की कुटी थी। आने-जाने वाले वहाँ से दिखायी देते थे।
                वक्ताराम बाबा ने देखा कि एक भद्र महिला बाबा की कुटी के बाह्य द्वार पर खड़ी है। सफेद साड़ी पहने थी। बाह्य द्वार से बाबा की कुटी में जाने से पहले उस भद्र महिला ने वक्ताराम को प्रणाम किया। वक्ताराम बाबा का मुख प्रसन्नता से खिल उठा। उन्होंने सोचा कि अब माल अवश्य मिल जायेगा और कहा- ‘‘पहले यहाँ आओ तब गुरू के पास जाओ।’’ परन्तु उस महिला ने वक्ताराम की बातों पर ध्यान नहीं दिया। वह कुछ घबरायी-सी लग रही थी। बेचारे वक्ताराम की आशाओं पर पानी फिर गया। उन्होंने तुरन्त कहा कि घोर अन्याय हो गया। शिव मन्दिर में तो पहले नन्दी पर जल चढ़ाया जाता है, फिर शिव पर चढ़ाया जाता है। यहाँ तो ठीक उल्टा व्यापार है। नन्दी पर जल चढ़ाया नहीं और शिव की पूजा! हमलोग जो बैठे थे, हँस रहे थे और वक्ताराम बाबा इस इन्तजार में थे कि वह भद्र महिला बाबा की कुटी से कब बाहर निकले। वह भद्र महिला ज्यों ही बाहर निकली कि वक्ताराम बाबा ने बुलाया और कहा- ‘‘अरी! सुन तो जा! आ इधर!’’ उस भद्र महिला ने कहा कि बेटा बीमार है। वक्ताराम बाबा ने अवसर देखा और कहा कि आ, यहाँ आ! उस भद्र महिला ने दूर से ही प्रणाम किया और जाने लगी। वक्ताराम बाबा ने कहा- ‘‘देख! हूँ फट स्वाहा! तुम्हारा बेटा हूँ फट स्वाहाहो जायेगा।’’
                वह भद्र महिला बड़हरवा की ही थी। बेटा नौजवान था, माँ वृद्धा थी। बुखार की अवस्था में माँ बेटे को छोड़कर आयी थी। पहुँचने पर उसने देखा कि उसका बेटा तड़प रहा था। धीरे-धीरे देह अकड़ती जा रही थी। डॉक्टर को बुलाया गया। डॉक्टर ने जवाब दे दिया। वह भद्र महिला दौड़ी-दौड़ी पुनः बाब के पास आयी। वक्ताराम बाबा आसन पर पूर्ववत् बैठे थे। उसी समय मैं नहाकर बाबा की पूजा के लिए कुटी में प्रविष्ट हुआ था। बाबा को प्रणाम किया, फूल चढ़ाया और देखा वह भद्र महिला सिसक रही थी। बाबा ने कहा- ‘‘क्या हुआ?’’ महिला ने कहा- ‘‘आपने आशीर्वाद दिया था बेटे के अच्छा हो जाने की, किन्तु उसे भूमि पर सुलाकर आयी हूँ।’’ बाबा गम्भीर हो गये। उन्होंने मुझसे कहा- ‘‘पाण्डेय, यह फूल उठा लो, और माँ के माथे से भी फूल ले लो। ले जाकर इसके बेटे के सिर और छाती पर रख दो।’’ मैंने माँ का पूजन अभी किया ही नहीं था। छोटी-सी लोटकी में जल था। वह भद्र महिला व्यग्र थी। मैं दौड़े-दौड़े गया। माँ पर जल चढ़ाकर चार रक्तपुष्प जल्दी-जल्दी उठाया और उस भद्र महिला के साथ रिक्शे से उसके घर पहुँचा। जो कुछ देखा, अवाक् रह गया। जीवन और मृत्यु का द्वन्द्व चल रहा था। श्वास बन्द होने ही वाली थी। मैंने फूल जब चढ़ाया, तो देखा कि अवस्था और बिगड़ गयी। श्वास की गति एकाएक रुक गयी। तब न जाने क्या प्रेरणा हुई कि माँ और बाबा का नाम लेकर रक्तपुष्प को छाती पर मला। मुँह पर अपनी लोटकी से जल ढाला। वह नौजवान तत्काल उठकर बैठ गया। माँगकर एक कुर्सी पर बैठा और कहा, ‘‘माँ, जल्दी चाय पिलाओ।’’ मैं तो आनन्दित था। यह अद्भुत चमत्कार, यह अद्भुत गुरू-कृपा आज भी मेरे मानस-पटल पर स्पष्टतः अंकित है।
                मैंने चाय नहीं पी और दौड़ता हुआ बाबा के पास पहुँचा। पूज्यपाद बाबा अर्द्धनिद्रा में थे। बाबा स्वतः जाग पड़े और मन्द-मन्द मुस्कराने लगे।
                मैं तो अपने को गौरवान्वित मान रहा था। मैं वक्ताराम बाबा के पास पहुँचा और बताया कि ऐसे हुआ, वैसे हुआ। मुर्दा उठकर बैठ गया। क्या झूठ-मूठ का फट स्वाहा करते हैं। वक्ताराम बाबा ने कहा कि गुरू ऐसा है कि मुझे मुखशुद्धी तक नहीं करने देता। बड़ा गुरू बना है। फिर वक्ताराम बाबा ने हूँ फट स्वाहाकिया और ताल ठोंककर कहा कि देखो अब फिर कैसे दौड़ी आती है। यह नन्दी नाच नचा देगा। मैं समझने की चेष्टा कर रहा था कि यह सब क्या हो रहा है! वक्ताराम बाबा बार-बार अपना सिर ठोंक रहे थे। कारन मिला नहीं था, इसलिए उनके मन की चंचलता और बढ़ रही थी। वे अत्यन्त व्यग्र थे, किन्तु पूज्यपाद गुरू महाराज शान्त थे। वह भद्र महिला पुनः दौड़ी-दौड़ी आयी और अबकी बार वह अत्यधिक व्याकुल और व्यग्र थी। उसका बेटा चीख रहा था। उसने बाबा को बताया कि मेरा बेटा कुछ ही क्षणों का मेहमान है। मैंने देखा कि बाबा के चेहरे पर किसी प्रकार का उद्वेग नहीं था। अबकी बार बाबा ने पोस्टल विभाग के एक कर्मचारी से, जो वहीं खड़ा था, कहा- ‘‘महावीर! माँ के पास से एक फूल उठाओ और उसे माँ के आशीर्वाद स्वरुप उस लड़के को दे आओ।’’ मैं वहीं था और सोच रहा था कि इस द्वन्द्व की परिणति क्या होगी? योगी और तांत्रिक का महाभिड़न्त! थोड़ी ही देर में वह पीऊन, जिसे बाबा महावीर कहते थे, लौटकर आया। उसने बाबा को सूचित किया कि बूढ़ी का बेटा बिलकुल ठीक हो गया है और अब वह चलने-फिरने लगा है। मुझे ऐसा लगा कि पहले मैं गया और मैंने जो कुछ भी किया, उससे मेरे मन में अहंकार का बीज अंकुरित हुआ था। बाबा ने यही कार्य एक पीऊन से, एक अति साधारण व्यक्ति से सम्पन्न करा कर मेरे अहंकार के अंकुर को उखाड़ फेंका। यह तो गुरू की कृपा थी। पीऊन और मैं तो सिर्फ माध्यम था, निमित्त थे। कर्ता तो कोई अन्य था।
                  मैं जाकर वक्ताराम बाबा से मिला। वक्ताराम बाबा मायूस थे और अट-पट बक रहे थे। उस समय पूज्यपाद गुरू महाराज कुटी के बरामदे में बैठे थे। बाबा को घेर कर बहुत-से लोग बैठे थे। महावीर भी उन्हीं में था। बाबा ने कहा कि किसी बर्तन में अग्नि जलाओ। मिर्च हाथ में लो और वक्ताराम बाबा के मुँह पर उसे डालकर हूँ फट स्वाहाकरो। बाबा ने मुझसे कहा, मेरी पत्नी से कहा और अन्य लोगों से भी कहा, किन्तु कोई तैयार नहीं हुआ। तब बाबा ने आज्ञाकारी महावीर से कहा, जो उनका अविचल भक्त था। उसने मूँछ पर हाथ फेरा, आग बर्तन में लिया और एक हाथ में मिर्च उठाया, आग प्रज्वलित थी। अभी हूँ फट स्वाहाभी नहीं किया था कि रानी दीदी, बाबा की एक शिष्या, चीख उठी- ‘‘यह क्या हो रहा है? तुमलोग अब वैसे नहीं मानेगा।’’ वह वक्ताराम के पास दौड़कर गयी और खड़ी हो गयी। गुरू शिष्य के बीच में। उन्होंने कहा कि हम वैसा नहीं होने देंगे, जैसा कि तुमलोग चाहते हो। वह बाबा पर ही टूट पड़ी। हाथ में पत्थर उठा लिया। सबलोग स्तब्ध थे। अब गुरू शिष्य दानों चुप थे। सिर्फ रानी दीदी की कड़कती आवाज वायुमण्डल में गूँज रही थी। सौन्दर्यमयी छवि, लम्बी-लम्बी जटाओं एवं दुःसह क्रोध से आरक्त मुखमण्डल के कारण उनके शरीर की झाँकी अपूर्व हो उठी थी। ऐसा लग रहा था, मानो साक्षात् माँ खड़ी हो! योगी और तांत्रिक के इस भयंकर महायुद्ध की युद्धभूमि में।
                बाबा कुर्सी से उठ भीतर जाकर सो गये। खर्राटे भरने लगे। शाम की बेला हो गयी। हमलोग कुटी में बैठे थे। वक्ताराम बाबा आये। वे रो रहे थे। उन्होंने अपने गुरू का श्रद्धा के साथ अभिवादन किया। माथा चरण पर रखा। पूज्यपाद गुरू अपने शिष्य के माथे पर अपना हाथ फेर रहे थे और वक्ताराम बाबा अपने एक हाथ से तकिये के नीचे कुछ खोज रहे थे। पूज्यपाद गुरू की आँखें सब कुछ देख रही थीं। उन्होंने कहा- ‘‘नहीं मानेगा तो ले ले, जितना चाहे उतना ले ले।’’ वक्ताराम बाबा अब हँस रहे थे। गुरूजी भी मुस्करा रहे थे। वक्ताराम बाबा मुट्ठी भर कर तकिये के नीचे से नोट निकालकर चलते बने। पूज्यपाद गुरू ने कहा कि यदि वक्ताराम शराब छोड़ देता, तो बहुत बड़ा तांत्रिक योगी बनता।
                तंत्र और योग के इस अभूतपूर्व युद्ध में कौन हारा और कौन जीता, यह कहा नहीं जा सकता। वस्तुतः गुरू शिष्य की यह लड़ाई केवल एक लीला थी, यह दिखाने के लिए कि योग और तंत्र दानों का अपना-अपना महत्व है। न कोई बड़ा है और न छोटा।
(साभार: मन मयूर)
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