आध्यात्म



                माँ बिन्दुवासिनी की पूजा यहाँ तीन पिण्डियों के रुप में होती है। बीच वाली पिण्डी में महादुर्गा तथा महाकाली का सम्मिलीत रूप है, उनके दाहिनी ओर महालक्ष्मी तथा बाँई ओर महासरस्वती प्रतिष्ठित हैं। जिस पिण्डी की पूजा पहाड़ी बाबा नित्यप्रति महादुर्गा के रुप में वैष्णव तरीके से करते थे, उसी पिण्डी की पूजा अमावस्या की मध्यरात्रि में वे महाकाली के रुप में तांत्रिक पद्धति से करते थे। हालाँकि बाबा की यह तांत्रिकपूजा भी वैष्णवही होती थी। जैसे, कारन (शराब) के स्थान पर काँसे के गिलास में रखा नारियल पानी चढ़ाया जाता था और बलि के नाम पर कुष्माण्ड’ (स्थानीय भाषा में भतुआ: कद्दू जाति की एक सब्जी) की बलि दी जाती थी। हाँ, चूँकि उन्होंने स्थानीय श्रद्धालुओं को पहाड़ी पर बकरे की बलि देने से रोक दिया था, अतः उसके बदले में अपनी कनिष्ठा उँगली या वक्षस्थल पर छोटा-सा चीरा लगाकर रक्त की एक-दो बूँद माँ काली को अर्पित करते थे। महादुर्गा और महाकाली की पूजन की यह परम्परा आज भी कायम है।
                जिस शिलाखण्ड पर हनुमानजी का पदचिन्ह अंकित है, उस शिला को दूसरी ओर (ईशान कोण) से देखने पर काली माता की जीभ का आभास होता है। अतः बिन्दुधाम में रहने वाले कुछ सन्यासियों ने इसे तांत्रिक साधना पीठ का रुप दिया था। 
                अपनी कुटिया के सामने स्थित छोटी-सी गुफा को बाबा ने ‘‘अद्वैतम्’’ नाम दिया था। इस गुफा में बाबा ब्रह्ममुहुर्त में ध्यान लगाया करते थे। बाबा से मिलने वालों के लिए कोई रोक-टोक नहीं थी- कोई भी किसी भी वक्त उनसे मिल सकता था, इसलिए ध्यानके लिए बाबा को अलग से यह व्यवस्था करनी पड़ी। क्योंकि ध्यान के समय मूलाधार चक्र (मानव जननांग) से ऊर्जा को जब सहस्रार चक्र (सिर के ऊपर) की ओर ले जाया जाता है, तब इस ऊर्जा को शरीर के बीच में कहीं नहीं छोड़ा जाता है- इससे नुकसान पहुँचता है। अतः किसी के आवागमन से ध्यान न टूटे, इसलिए यह गुफा बनी। गुफा के ऊपर ही दीक्षा-कुटीर है। (पहाड़ी बाबा के समय में उनकी कुटिया की छप्पर फूस की हुआ करती थी, अब छत पक्की है। इसी प्रकार, दीक्षा-कुटीर भी फूस की छप्पर वाली कच्ची कुटिया थी। जीर्ण-शीर्ण हो जाने के कारण हाल ही में इसके स्थान पर एक सुन्दर पक्के मन्दिर का निर्माण किया गया है।) 
                माँ बिन्दुवासिनी प्रतिवर्ष 7 आषाढ़ को ऋतुवती होती हैं। उस दौरान चार दिनों के लिए माँ का पट बन्द रहता है। पाँचवे दिन अम्बूवाची निवृत्ति की विशेष पूजा के साथ माँ का पट खुलता है। माँ के अम्बूवाची निवृत्ति के वस्त्र के टुकड़ों को बहुत-से भक्तजन सम्भाल कर रखते हैं। इसके धागों को ताबीज में भरकर वे स्वयं पहनते हैं तथा बच्चों को पहनाते हैं। उनका मानना है कि इससे उनकी रक्षा होती है।
                इसके अलावे आषाढ़ में गुरू पूर्णिमा, कार्तिक में पहाड़ी बाबा का जन्मोत्सव (कार्तिक पूर्णिमा) और गोपाष्टमी की सन्ध्या गौशाला मेला यहाँ मनाया जाता है। वर्ष 2000 में पहाड़ी बाबा के जन्मशतवार्षिकी के अवसर पर अमृत कलशस्थापित किया गया था (समाधि-स्थल के पीछे, गौशाला के सामने)।
                मन्दिर के दूसरे प्रवेश द्वार के पास सीढ़ियों की दाहिनी ओर आम के एक पेड़ को कल्पतरुकी मान्यता प्राप्त है। यहाँ लोग मनौती माँगने के साथ एक पत्थर पेड़ से बाँध देते हैं और मनोकामना पूर्ण होने पर दुबारा यहाँ आकर एक पत्थर को खोल देते हैं। पहले यह मान्यता दूसरे पेड़ को प्राप्त थी; अब वह पेड़ नहीं रहा। उसके स्थान पर ही मन्दिर के सामने का बरामदा बना है।
                रामनवमी के अवसर पर पाँच दिनों तक चलने वाले शतचण्डी महायज्ञ का अपना अलग ही महत्व है। बहुत-से भक्तजन यज्ञ के कुछ दिनों बाद हवन के भस्म को घरों में सम्भाल कर रखते हैं।

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